नीति व धर्म
मैं अत्यंत
आनंदित हूं कि आपसे इस संध्या अपने हृदय की थोड़ी सी बातें कर सकूंगा। अभी कहा गया कि
यह समय अंधकार पूर्ण है और यह युग पतन का, भौतिकवाद का,
और मेटेरियलिज्म का है। सबसे पहले मैं आपको मैं निवेदन कर दूं,
यह बात अत्यंत गलत है, यह बात झूठी है। इस बात से यह भ्रम पैदा
होता है कि पहले के लोग प्रकाशपूर्ण थे और आज के लोग अंधकारपूर्ण हैं। इससे यह भ्रम पैदा होता है कि पहले कि लोग अंधकार में नहीं थे और हम
अंधकार में हैं। इस भ्रम के पैदा हो जाने के कुछ कारण हैं लेकिन यह बात सच नहीं है।
हम अनैतिक हैं, और पहले के लोग नैतिक थे यह बात भी ठीक नहीं
है।
अगर पहले के
लोग नैतिक थे तो महावीर ने किसको समझाया कि हिंसा मत करो, चोरी मत करो, असत्य मत बोलो। बुध्द ने किसको उपदेश दिए। राम और कृष्ण किन लोगों को समझा रहे
थे अच्छा होने के लिए? अगर लोग अच्छे थे तो
ये उपदेश व्यर्थ थे,
झूठे थे। इनकी कोई जरूरत न थी। इस दुनिया में, पुरानी सदियों में इतने बड़े बड़े शिक्षक हुए , ये क्यों पैदा हुए?
जहां अंधेरा होता है वहां दीयों की जरूरत पड़ती है।
जहां भूलें होती हैं,वहां शिक्षक पैदा होते हैं। जहां
गल्तियां होती हैं वहां सुधारक का जन्म होता है। अगर पिछली सदियों में इतने
बड़े सुधारक दुनिया में पैदा हुए यह किस बात
का सबूत है?
यह इस बात का
सबूत है, उन दिनो के लोग भी हमारे जैसे लोग थे जैसे
हम हैं वैसे ही वे लोग थे। वे भी चोरी करते थे और वे भी बेईमान थे और वे भी हिंसा करते
थे और यु़ध्द करते थे। अगर वे बेईमान नहीं
थे तो ईमानदारी की शिक्षाएं किसके लिए थीं?
अगर वे चोर नहीं थे तो चोरी न करने की बातें किसको समझाई जा
रही थीं? वे हम जैसे ही लोग थे आदमी में कोई फर्क नहीं
पड़ा है।
तो मैं आपसे
कहना चाहूंगा, ये सदी अंधकार में है इससे यह मतलब न लें
कि पहले के लोग प्रकाश में थे। आदमी आज तक
अंधकार में ही रहा है। यह भ्रम इसलिए पैदा होता है कि
हमें लगता है कि पहले के लोग अच्छे थे। इसके भ्रम के पैदा होने के पीछे कोई कारण है वह यह है, हम सारे लोग अभी जमीन पर हैं। हजार साल बाद हमारी याद करने वाला कौन होगा? कोई भी नहीं। लेकिन गांधी याद रह जाएगें, हम सारे लोगों के नाम भूल जाएगें, हम सारे लोगों के कृत्य, हमारी नीति-अनीति सब भूल जाएगें। एक गांधी याद रह जाएगा हमारे बीच से। और हजार साल बाद लोग सोचेंगे कि गांधी इतना अच्छा आदमी था तो उस जमाने के सारे लोग अच्छे रहे होंगे!
हमें लगता है कि पहले के लोग अच्छे थे। इसके भ्रम के पैदा होने के पीछे कोई कारण है वह यह है, हम सारे लोग अभी जमीन पर हैं। हजार साल बाद हमारी याद करने वाला कौन होगा? कोई भी नहीं। लेकिन गांधी याद रह जाएगें, हम सारे लोगों के नाम भूल जाएगें, हम सारे लोगों के कृत्य, हमारी नीति-अनीति सब भूल जाएगें। एक गांधी याद रह जाएगा हमारे बीच से। और हजार साल बाद लोग सोचेंगे कि गांधी इतना अच्छा आदमी था तो उस जमाने के सारे लोग अच्छे रहे होंगे!
आपको पता है
बुध्द के समय में कौन सा आदमी जमीन पर था? कौन सा आदमी
सड़कों पर चल रहा था? कौन सा गांवों में रह रहा था? आपको पता है कि राम के वक्त में कौन लोग थे? आपको पता है कृष्ण के वक्त में कौन लोग थे? सामान्य आदमी की कोई कथा बाकी नहीं रह जाती जो कि असली आदमी
है।
थोड़े से अपवाद,
थोड़े से एकसेपशन्स याद रह जाते हैं। और उनके आधार पर हम निर्णय करते हैं कि
पहले के लोग अच्छे रहे होंगे। बुध्द अच्छे थे महावीर अच्छे थे। तो गांधी अच्छे थे तो
हम अच्छे हैं? बल्कि सच्चाई यह है कि अगर सारे लोग अच्छे
हो जाएं तो गांधी को
याद रखने की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी। अगर महावीर के समय के सारे लोग अच्छे होते तो
महावीर का नाम हम कभी का भूल गए होते। वह उस पूरे अंधेरे में एक आदमी चमकता हुआ था
इसलिए दिखाई पड़ रहा है आज तक। अगर सारे लोग चमकते हुए होते वे महावीर कभी के भूल जाते,
वे कृष्ण भी कभी के भूल जाते। ये दस पंद्रह लोगों के नाम हमें
याद है केवल इसलिए कि इस पूरी अंधेरी रात में ये दस-पांच चमकते हुए सितारे हैं।
लेकिन आदमी
की जिंदगी आज तक जमीन पर अंधेरे से भरी रही है। पंद्रह हजार युध्द लड़े गए हैं पांच
हजार वर्षों में। पंद्रह हजार युध्द किन लोगों ने लड़े? अगर वे अच्छे लोग थे कौन लड़ रहा था? हिंदुस्तान
की जमीन पर बुध्द के समय में दो हजार राज्य थे। और हर रोज इस जमीन पर लड़ाई हो रही थी।
कौन लड़ रहा था वह लड़ाई? और लड़ाई प्रेम से लड़ी
जाती है? ईमानदारी से? लड़ाइयां कैसे लड़ी जाती हैं?
महाभारत हुआ हमारे इस मुल्क में, जिनको हम बहुत अच्छे लोग कहते थे वे भी अपनी औरत को जुए पर दांव
में लगा रहे थे। कैसे अच्छे लोग रहे होंगे? और अच्छे लोग थे तो जमीन के लिए लड़े। सारे मुल्क को शायद दो चार हजार साल के लिए रीढ़ तोड़ दी। जुआ खेलते थे,
औरत को दांव पर लगा सकते थे। अच्छे लोग थे?
बात असल यह है कि अतीत तो हमें भूल जाता है और वर्तमान
हमें दिखाई पड़ता है। आप कहते हैं, पीछे के लोग अच्छे
थे और आज के लोग अंधेरे में हैं आज तक जमीन पर जितनी किताबें लिखी गई हैं पुरानी से
पुरानी किताब भी यही कहती है कि पहले के लोग अच्छे थे। वे पहले के लोग कब थे?
आपने कोई ऐसी किताब पढ़ी है जो यह कहती हो आज के लोग अच्छे हैं।
चीन में सबसे
पुरानी किताब है छह हजार वर्ष पुरानी वह भी कहती है कि पहले के लोग बहुत अच्छे थे आज
के लोग बिलकुल बिगड़ गए हैं। ये जमाना अंधकार का आ गया है। छह हजार वर्ष पुरानी किताब
भी यही कहती है कि पहले के लोग अच्छे थे और आज का जमाना अंधकार का है। अगर आप उस किताब
को पढ़ें तो ऐसा लगेगा हमारे जमाने के बाबत कह रहें हैं ये लोग।
नहीं,
इसमें कोई बुनियादी भ्रम है। पहले के लोग अच्छे कहने का कारण
यह नहीं है कि पहले के लोग अच्छे थे लेकिन आज के आदमी को कंडेम्न करना हो उसकी निंदा
करनी हो तो इसके सिवाय कोई उपाय नहीं कि हम पहले के आदमी को अच्छा कहें और इसको नीचा
दिखाएं। इसको नीचा दिखाने की हमारी बड़ी इच्छा है। जो हमारे साथ आदमी खड़ा है,
उसे नीचा दिखाने की इच्छा है। इसको कैसे नीचा दिखाएं?
इसको नीचा दिखाने का एक रास्ता है कि पहले के लोग बहुत अच्छे
थे।
अगर पहले के
लोग अच्छे थे तो ये बुरे लोग उन अच्छे लोगों से कैसे पैदा हो गए? अगर पहले की सभ्यता और संस्कृति अच्छी थी तो यह दुष्परिणाम कैसे
आया? यह उसी का तो फल है। यह उसी का तो कांसिक्वेंस है। यह उसी में
से तो निकला है। यह जो कुछ निकला है उससे ही पैदा हुआ है।
मैं क्या कहना चाहता हूं यह बात कह कर?
मैं यह बात कह कर यह कहना चाहता हूं कि ये सवाल किसी
युग का नहीं है कि आदमी अंधकार में है यह आदमी का चित्त जैसा है अभी और आज तक जैसा
रहा है, उस चित्त से यह अंधकार पैदा हो रहा है,
यह किसी युग की भूल नहीं है
यह आदमी का चित्त जैसा है उसका परिणाम है। और जब
तक हम आदमी के चित्त को बदलने की कीमिया, तरकीब,
उसको बदलने की विधि नहीं समझ लेते हैं और जब तक हम बहुत बड़े
पैमाने पर आदमी की चेतना को बदलने का उपाय नहीं करते हैं तब तक जमीन पर अंधकार रहेगा,
यह किसी युग का सवाल नहीं है। ये सतयुग और कलियुग का सवाल नहीं
है।
यह सवाल आदमी
के मन का है और आदमी का मन वही है जो पांच हजार साल पहले था उसमें कोई फर्क नहीं पड़ा।
यह आदमी का मन क्या है जो अंधकार ले आता है? और इधर पांच हजार सालों में हमने कोशिश की इसको बदलने की वह कोशिश असफल क्यों हो गई?
और हम आज भी वही दोहराते हैं इस आदमी को बदलना है।
तो उन्हीं बातों को दोहराते हैं जो पांच हजार साल में नाकामयाब साबित हो गईं। फिर भी
उन्हें बातों को दोहराते हैं तो यह जमाना आगे भी अंधकारपूर्ण रहेगा। अगर उन्हीं बातों
को हम दोहराए चले गए तो वे कौन सी बातें हैं जिनकी वजह से आदमी का चित्त नहीं बदल सका?
कौन सा कारण है जिनकी वजह से आदमी वहीं-वहीं चक्कर काट रहा है जैसे कोल्हू का बैल चक्कर काटता हो?
जमाने गुजर जाते हैं, सदियां गुजर जाती हैं, आदमी वहीं का वहीं
है।
कौन सी बातें हैं? उनमें से एक बात सबसे शुरू में आपसे कहूं। निरंतर हमसे कहा जाता है कि आदमी को नैतिक होना चाहिए,
मारल होना चाहिए। यह शिक्षा बहुत पुरानी है। यह कोई आज तो नहीं कहा जा रहा है,
यह हमेशा से कहा जा रहा है फिर आदमी नैतिक क्यों नहीं हो गया? तो हम दोष देते हैं कि आदमी की कोई गलती है इसलिए नैतिक नहीं हो गया।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि कोई आदमी नैतिक हो ही
नहीं सकता बिना धार्मिक हुए। और धार्मिक होना बड़ी दूसरी बात है। कोई आदमी नैतिक नहीं
हो सकता बिना धार्मिक हुए। लेकिन हमको तो बताया जाता रहा है कि नैतिक हो जाइए तो फिर
आप धार्मिक हो सकते हैं, बिना नैतिक हुए धार्मिक
नहीं हो सकते। यह बात बिलकुल ही उल्टी और गलत है। नैतिकता धार्मिक मनुष्य की सुगंध
है।
भीतर चित्त में धर्म हो तो जीवन में होती है नीति।
अंतःकरण परिवर्तित हो जाए तो आचरण हो जाता है दूसरा। नीति का संबंध है आचरण से,
धर्म का संबंध है अंतःकरण से। लेकिन पांच हजार वर्षों से हम
कह रहे हैं आदमी को नैतिक बन जाने को और बिना अंतःकरण बदले हुए जो आदमी अपने आचरण को
बदल लेता है वह नैतिक तो नहीं होता विकृत जरूर हो जाता है।
क्या मतलब मेरा यह कहने का? मेरा कहने का यह मतलब है कि जो आदमी अपने जीवन को नैतिक बनाने
में लगता है वह क्या करेगा? अगर उसके भीतर सेक्स
है काम है जो कि होना चाहिए और है। उसके जीवन का स्वभाव का हिस्सा है। तो वह क्या करेगा
नैतिक बनने को? वह आदमी ब्रह्मचर्य की कसमें लेगा नैतिक बनने
को।
ब्रह्मचर्य की कसमों से क्या होने वाला है?
इतना ही होने वाला है कि वह आदमी अपने सेक्स को भीतर दबाए चला
जाएगा, दबाए चला जाएगा। ऊपर से ब्रह्मचर्य को ओढ़
लेगा और भीतर सेक्स को दबा लेगा, सप्रेस कर लेगा। वह
दबी हुई कामुकता, वह दबा हुआ सेक्स नष्ट नहीं होगा उसके भीतर
उसके अचेतन मन की पर्तों में घूमने लगेगा। रात सपनों में आने लगेगा। कमजोर क्षणों में
प्रकट होने लगेगा। वह उसके भीतर निरंतर मौजूद रहेगा और उसकी मौजूदगी उसको भयभीत कर
देगी। वह घबड़ाया हुआ रहने लगेगा उसको अगर कहीं अगर स्त्री दिख जाए तो वह घबड़ाएगा वह आंख बंद कर लेगा। वह दूर भागेगा,
जंगलों में जाएगा, बस्तियां छोड़ेगा
क्योंकि भीतर भय है कि कहीं उसका ब्रह्मचर्य न टूट जाए। और ब्रह्मचर्य टूट जाने का
भय क्यों है? भय है कि भीतर सेक्स की लहरें धक्के दे रही
हैं। उनको वह ऊपर से दबाए हुए बैठा हुआ है।
एक छोटी सी कहानी कहूं उससे मेरी बात समझ में आए
और मैं आगे बढ़ सकूं। एक छोटी सी पहाड़ी नदी को दो भिक्षु पार कर रहे थे। एक वृध्द भिक्षु
था और एक युवा। वृध्द भिक्षु जैसे ही नदी के किनारे आया उसने देख कि सांझ होने को है,
सूरज ढलने को है। पहाड़ी नदी है। और एक युवती नदी के किनारे खड़ी
है, संभवतः उसे नदी पार होना है। लेकिन अकेले नदी में उतरने का साहस
नहीं कर पा रही है। सहज ही उसके मन को ख्याल हुआ इसे हाथ का सहारा दे दूं और नदी पार
करा दूं। लेकिन तीस वर्ष से उसने किसी स्त्री को छुआ नहीं था।
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